Sunday, July 19, 2020

कुर्बानी के दिनों में कुर्बानी से बढ़कर कोई अमल नहीं

कुर्बानी के दिनों में कुर्बानी से बढ़कर कोई अमल नहीं

     नबी सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया कुर्बानी के दिन में कोई अमल अल्लाह ताला को खून बहाने से ज्यादा पसंदीदा नहीं है और यह कुर्बानी का जानवर कयामत के मैदान में अपने सिंघो बालों और खुरों के साथ आएगा, और कुर्बानी में बहाया जाने वाला खून जमीन पर गिरने से पहले अल्लाह ताला के दरबार में क़बूलियत का मकाम हासिल कर लेता है इसलिए खुश दिल्ली से कुर्बानी किया करो. 

कुर्बानी के बजाये सदका काफी नहीं

 यह बात जान ले के कुर्बानी के दिनों में जानवर का ज़बह करना ही ज़रूरी है, जानवर की कीमत के सदका करने से काम नहीं चल सकता है, और जो शख्स मालदार होने के बावजूद कुर्बानी नहीं करेगा वह सख्त गुनहगार होगा क्योंकि वह वाजिब को छोड़ने वाला है.

आजकल कुछ *मॉडर्न सोच* वाले लोग कुर्बानी के बजाय सदका करने पर ज़ोर देते हैं तो उनकी यह बात शरीयत के बिलकुल खिलाफ है.

कुर्बानी किस पर वाजिब है?

 जिस पर सदक़ए फित्र वाजिब है उस पर बकरा ईद के दिनों में कुर्बानी करना भी वाजिब है, और अगर इतना माल ना हो कि जिस पर सदक़ए फ़ितर  वाजिब होता हो तो उस पर कुर्बानी वाजिब नहीं है लेकिन फिर भी अगर कर दे तो सवाब है.

बीवी बच्चों की तरफ से कुर्बानी?

 कुर्बानी सिर्फ अपनी तरफ से करना वाजिब है औलाद की तरफ से वाजिब नहीं, बल्कि अगर नाबालिग औलाद मालदार भी हो तब भी उसकी तरफ से करना वाजिब नहीं है, ना अपने माल में से ना उसके माल में से, क्योंकि उस पर कुर्बानी वाजिब ही नहीं होती. लेकिन अगर बाप अपने माल में से अपनी नाबालिग औलाद की तरफ से कुर्बानी कर दे तो मुस्तहब / अच्छा है .

बीवी और बालिग औलाद मालदार हो तो उनको अपनी तरफ से कुर्बानी करना वाजिब है.

 कुर्बानी के 3 दिन हैं यानी 10/ 11/ और 12/ जि़लहिज्जा, इससे पहले या बाद में कुर्बानी मोतबर नहीं है .

कौन से दिन कुर्बानी अफज़ल/ बेहतर है?

 10 ज़िलहिज्जा को कुर्बानी करना सबसे अफज़ल है ,उसके बाद 11/और 12 ज़िलहिज्जा का दर्जा है .

रात में कुर्बानी करना ?

 कुर्बानी के दिनों में रात में कुर्बानी करना मकरु है इसलिए रात में कुर्बानी ना करें और अगर रात में कुर्बानी करें और अगर रात में कुर्बानी करे तो रोशनी वगैरह का अच्छा इंतजाम रखे, ऐसा ना हो कि अंधेरे की वजह से ज़बह में कमी रह जाए.

कुर्बानी के वक्त में शहर और गांव का फर्क

 कुर्बानी का असल वक्त 10/ ज़िलहिज्जा की सुबह सादिक से शुरू होकर 12/ ज़िलहिज्जा के सूरज डूबने तक रहता है,

 जिस बड़ी आबादी में ईद की नमाज होती है वहां ईद की नमाज के बाद ही कुर्बानी दुरुस्त होगी और जहां ईद की नमाज जाइज़ ना हो जैसे छोटे गांव और देहात तो वहां सुबह सादिक के फ़ौरन बाद से कुर्बानी दुरुस्त है.

 ईद की नमाज के बाद ख़ुत्बा  से पहले कुर्बानी

 अगर ईद की नमाज के बाद ख़ुत्बा से पहले कुर्बानी की तो दुरुस्त हो जाएगी लेकिन ऐसा करना अच्छा नहीं है, बेहतर यह है कि ख़ुत्बा के बाद ही कुर्बानी की जाए.

इमाम ने बगैर वजू ईद की नमाज पढ़ा दी तो नमाज और कुर्बानी का क्या हुकुम है?

अगर इमाम ने भूल से बगैर वजू ईद की नमाज पढ़ा दी फिर ईदगाह में मजमा बिखर जाने के बाद उसे याद आया तो दोबारा ईद की नमाज का हुकुम नहीं है; लेकिन अगर मजमा बिखरने से पहले याद आ गया तो ईद की नमाज दोहराई जाएगी,

और अगर कोई शख्स ऐसी सूरत में नमाज दोहराने से पहले कुर्बानी कर दे तो उसकी कुर्बानी दुरुस्त मानी जाएगी.

ईदगाह की नमाज के बाद कुर्बानी

अगर ईदगाह में ईद की नमाज अदा कर ली गई हो और मेहल्लों की मस्जिदों में 
 ईद की नमाज में देर हो तो भी कुर्बानी करना दुरुस्त है.



 कुर्बानी के सही होने के लिए शहर में किसी भी जगह ईद की नमाज़ होना काफी है

 अगर शहर में किसी जगह ईद की नमाज़ पढ़ ली जाए तो पूरे शहर वालों के लिए कुर्बानी करना दुरुस्त हो जाता है इसमें ईदगाह या जामा मस्जिद वगैरह की नमाज़ का होना ज़रूरी नहीं है-

 जिस शहर में कुर्बानी की जाए वहीं की ईद की नमाज़ का ऐतबार है

अगर किसी शख्स ने दूसरे शहर में कुर्बानी का इंतज़ाम किया हो तो उसी शहर में नमाजे ईद के बाद कुर्बानी दुरुस्त होगी (मान लीजिए अगर मालिक के शहर में ईद की नमाज ना हुई हो तो उसका इंतजार नहीं किया जाएगा)


वो रगे जिन का काटना ज़रूरी है

जानवर के गले मे चार रगे होती हैँ। 
1) हुलक़ूम (सांस की रग )
2) मर्री (खाने पीने की रग )
3-4) दोषा रगे (खून की नालिया )
इन चारो रगो मे से किसी भी तीन का काटना ज़रूरी है, 
गुध्धी (गर्दन )की तरफ से काटना मकरु है। 

अगर गर्दन अलग हो गई

अगर ज़िबाह करते वक़्त गर्दन अलग हो गई,तो क़ुर्बानी दुरुस्त है,  मगर मकरु होगी (एहतियात से ज़िबाह करें )

तस्मियां (बिस्मिल्लाह, अल्लाहु अकबर )पढ़ना

ज़िबाह करते वक़्त बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर पढ़ना ज़रूरी है, अगर भूल जाये,तो कोई बात नहीं, 
अगर जानबूझ कर बिस्मिल्लाह छोड़ दिया तो जानवर हराम है, 
बाज़ दफा एक या दो रग कटने पर ही क़साईं छुरी ले लेता है, तो उस वक़्त क़साईं पर भी तसमियां ज़रूरी है,ज़िबाह मे मदद करने वालो पर भी बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर पढ़ना ज़रूरी है, 
ज़िबाह करने मे छुरी पकड़ कर जो मदद कर रहा उस पर भी बिस्मिल्लाह पढ़ना ज़रूरी है.


 कम कीमत की वजह से दूसरी जगह कुर्बानी

सस्ती कीमत की वजह से दूसरी जगह कुर्बानी कराने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन यह बात याद रहे कि माली इबादत में जितना ज्यादा रुपया खर्च किया जाता है सवाब उतना ही ज्यादा मिलता है -

 दिखावे के लिए महंगा जानवर खरीदना

आज कल  कुछ लोग सिर्फ नाम वरी और दिखावे के लिए ज्यादा कीमत का जानवर खरीदते हैं और फिर उसका खूब चर्चा करके खुश होते हैं तो इस दिखावे के साथ सवाब की उम्मीद रखना सिर्फ धोखा है अल्लाह ताला के नजदीक वही अमल मकबूल है जो सिर्फ अल्लाह को राजी करने के लिए किया जाए दिखावे का जानवर कितना ही कीमती हो अल्लाह की नजर में उसकी कोई कीमत नहीं -  


अगर जानवर के पेट से बच्चा निकला?

अगर जानवर के पेट से ज़िंदा बच्चा निकला तो उसको भी ज़िबह कर दें, 
अगर मरा हुआ बच्चा निकला तो वो बच्चा हलाल नहीं उसको दफन कर दें। 

मकरूहात

जानवर के सामने या जानवर को गिराने के बाद छुरी वगैरह तेज़ करना मकरू है,(छुरी पहले ही तेज़ कर लें, )
क़ुर्बानी के जानवर पर सवारी करना मकरू है, 
जानवर ज़िबह करने के बाद जानवर के ठंडा होने से पहले मुंडी फोड़ना या खाल उतारना मकरू है, (ठंडा होने के बाद ये काम करें )
क़ुर्बानी का जानवर किराए पर देना मकरू है, 
क़ुर्बानी के जानवर का बाल और दूध निकालना मकरू है (अगर बाल या दूध निकाल लिया है तो सदक़ा करना ज़रूरी है)

क़ुर्बानी करने वाला एक ज़िल हिजजा से क़ुर्बानी तक बाल वगैरह ना काटे

जिसकी तरफ से क़ुर्बानी होने वाली है उसके लिए मुस्तहब ये है, के ज़िल हिजजा का महीना शुरू होने के बाद से क़ुर्बानी तक बदन के बाल और नाख़ून वगैरह ना काटे (ये अमल मुस्तहब है )
(मुस्लिम शरीफ किताब उल अज़हिया )

मुफ़्ती मुहम्मद फैज़ान क़ासमी रामपुरी


 मालदार की कुर्बानी का जानवर गुम हो गया

  जिस शख्स पर कुर्बानी वाजिब हो और उसने जो जानवर कुर्बानी की निय्यत से रखा हो वह कुर्बानी से पहले गुम हो जाए तो उस पर उसकी जगह दूसरे जानवर की कुर्बानी जरूरी होगी -

 मालदार की कुर्बानी का जानवर मर गया

    मालदार शख्स ने कुर्बानी के लिए जो जानवर तय किया था अगर वह कुर्बानी से पहले मर जाए तो उस पर दूसरे जानवर की कुरबानी जरूरी होगी -

 मालदार का कुर्बानी के जानवर को बदलना

      मालदार शख्स को इख्तियार है कि वह अपना तय क्या हुआ जानवर कुर्बानी से पहले बदल ले और उसकी जगह दूसरे जानवर की कुर्बानी करे; कियोंकी मालदार शख्स के तय करने से पहले कुर्बानी का जानवर तय नहीं होता इसलिए उसे बदलने का इख्तियार रहता है-                                                                   

क़ुर्बानी के जानवर की खाल

क़ुर्बानी के जानवर की खाल सदक़ा की जा सकती है, और अगर खाल को ऐसे ही इस्तेमाल मे लाया जा रहा है,तो जाइज़ है, जैसे जानमाज़ बनाना वगैरह, 
अलबत्ता अगर खाल को बेच दिया है,तो अब उसकी क़ीमत को इस्तेमाल मे लाना जाइज़ नहीं है,बल्कि क़ीमत सदक़ा कर दें, 
और खाल के अलावा दूसरे अंग जैसे: हड्डी खाल वगैरह को बेचना जाइज़ नहीं, अगर किसी ने बेच दिया तो उसकी क़ीमत सदक़ा करना ज़रूरी है
इसी तरह जान की खाल वगैरह को मज़दूरी के तोर पर क़साइ को देना दुरुस्त नहीं है,अगर दे दिया तो इतनी क़ीमत सदक़ा करना ज़रूरी है (अगर उजरत के अलावा दे,तो कोई हर्ज नहीं )

हलाल जानवर के वो सात आज़ा जिनका खाना जाइज़ नहीं

1) मुजककर जानवर की शर्म गाह
2) मॉन्नस जानवर की शर्म गाह 
3) मुज़ककर जानवर का खुसया 4) मसाना
 5) गदूद
 6) हराम मगज़ जो रीड़ की हड्डी मे रहता है,  
7) पित्ता (वो थैली जो जानवर की कलेजी से लगी रहती है )
दमे मसफूह (रगो मे बहने वाला पतला खून )बिलकुल हराम और नापाक है, 
हलाल जानवर की ओजड़ी खाना बिला कराहत जाइज़ है, 


 ग़रीब शख्स की कुर्बानी का जानवर गुम हो गया

अगर ऐसे शख्स ने जिस पर कुर्बानी वाजिब ना थी कोई जानवर कुर्बानी की नियत से खरीद लिया था फिर वह कुर्बानी से पहले गुम हो गया तो उस पर दूसरे जानवर की कुर्बानी जरूरी नहीं है,

 ग़रीब शख्स की कुर्बानी का जानवर मर गया

गरीब शक्स ने कुर्बानी के लिए जानवर खरीदा था या मन्नत के तौर पर तय किया था फिर वह कुर्बानी से पहले मर गया तो उस पर दूसरे जानवर की कुरबानी जरूरी नहीं है-

 ग़रीब का कुर्बानी के जानवर को बदलना

गरीब शख्स ने अगर जानवर कुर्बानी के लिए जुबान से कहकर तय कर लिया हो तो अब उसके लिए बदलने की इजाजत नहीं बल्कि उसी तय किए हुए जानवर की कुर्बानी जरूरी है-                                                                  

ज़िबह करने का मस्नून तरीक़ा

अपने जानवर को खुद अपने हाथो से ज़िबह करें,अगर अपने हाथ से नहीं कर सकता है,तो दूसरे से ज़िबह कराने मे कोई हर्ज नहीं,मगर बहतर ये है के ज़िबह के वक़्त खुद वहां मौजूद रहे। 
पहले छुरी खूब अच्छी तरह तेज़ करले। 
जानवर को क़िब्ला रुख इस तरह लिटाए, के उसके चारो पैर और हलक़ क़िब्ला रुख हों,और ज़िबह करने वाला गर्दन के पास इस तरह खड़ा हो के उसका रुख भी क़िब्ले की तरफ हो जाए। 
क़ुर्बानी की नियत सिर्फ दिल से करना काफ़ी है,ज़बान से नियत के अल्फाज़ कहना ज़रूरी नहीं,अलबत्ता ज़िबह करते वक़्त ज़बान से बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर कहना ज़रूरी है۔

 फिर ये दुआ पढ़ें....

إِنِّي وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ حَنِيفًا ۖ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ، إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي وَمَحْيَايَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ 
الْعَالَمِينَ".
 और ज़िबह करने से पहले  ये दुआ पढ़े...

"اللّٰهُم َّمِنْكَ وَ لَكَ"’’بسم اللہ اللہ اکبر‘‘

और ज़िबह करने के बाद ये दुआ पढ़े

"اَللّٰهُمَّ تَقَبَّلْهُ مِنِّيْ كَمَا تَقَبَّلْتَ مِنْ حَبِيْبِكَ مُحَمَّدٍ وَ خَلِيْلِكَ إبْرَاهِيْمَ عليهما السلام".

अगर किसी और की तरफ से ज़िबह कर रहा हो तो "مِنِّيْ" की जगह " مِنْ " के बाद उस शख्स का नाम ले..  

क़ुर्बानी के बदले क़ुर्बानी की रक़म सदक़ा खैरात नहीं कर सकते

क़ुर्बानी के तीन दिनों मे जानवर की क़ुर्बानी ना करके इतनी रक़म गरीबो, मिसकीनो या किसी और ज़रूरत की जगह देने से ये वाज़िब अदा नहीं होगा, बल्कि हमेशा गुनहगार रहेगा। कुछ लोग कहते हैँ, के हर साल क़ुर्बानी मे इतनी रक़म सारे मुस्लमान खर्च करते हैँ, वही रक़म से ना जाने कितने गरीबो की शादीयां हो सकती हैँ, और कितने गरीबो के  रोज़गार का इन्तिज़ाम किया जा सकता है, या फसाद ज़दा इलाको मे क़ुर्बानी की रक़म से इमदाद की जा सकती है, 
ऐसी बात दीने इस्लाम से ना वाक़िफ़ और इस्लाम से बेज़ार लोग ही कह सकते हैँ,  उनसे कोई पूछे ये तमाम काम तुम्हारे क़ुर्बानी करने से रुके हुए हैँ क्या? ये बात अच्छी तरह याद रखो के नमाज़ एक अलग इबादत है, रोज़ा एक अलग इबादत है, नमाज़ से रोज़े का फ़र्ज़ अदा नहीं होगा, और रोज़े से नमाज़ का फ़र्ज़ अदा नहीं होगा, इसी तरह सदक़ा खैरात एक अलग इबादत है, और क़ुर्बानी एक अलग इबादत है, क़ुर्बानी की इबादत सदक़ा खैरात से अदा नहीं होगी, बल्कि क़ुर्बानी के अमल से hi अदा होगी,, इसी पर नबी करीम (स अ व )और तमाम सहाबा और ताबाईन का तअमुल है। 


 जानवर गुम होने के बाद मिल गया

अगर गुमशुदा जानवर बाद में मिल जाए तो उसकी कई सूरते हैं:

(१) अगर मालदार का गुमशुदा जानवर मिला है तो उस पर खास उसी जानवर की कुरबानी जरूरी नहीं है बल्कि किसी भी एक जानवर की कुरबानी कर सकता है -

(२) गरीब शख्स का गुमशुदा जानवर मिल गया और उसने अभी कोई और जानवर कुर्बानी की नियत से नहीं खरीदा था तो उस पर सिर्फ हासिल सुधा यानी मिले हुए जानवर की कुर्बानी करना ज़रूरी है-

(३) और अगर गुमशुदा के मिलने से पहले गरीब कोई और जानवर कुर्बानी के लिए खरीद चुका था बाद में गुमशुदा भी मिल गया तो अब उस पर नए खरीदे हुए और हासिल शुदा यानी गुम होने के बाद मिले हुए दोनों जानवरों की कुर्बानी ज़रूरी होगी -                                                

 मरहूम की तरफ से कुर्बानी

 अगर कोई शख्स अपने मरहूम रिश्तेदारों की तरफ से नकली कुर्बानी करें तो इसमें कोई हर्ज नहीं है और यह तरीका उम्मत में बगैर किसी इखतिलाफ के जारी है और इस तरह की कुर्बानी का गोश्त कोई भी खा सकता है इसमें फकीर या ग़रीब का होना ज़रूरी नहीं है,

 हुजूर की तरफ से कुर्बानी

अगर कोई शख्स अपनी तरफ से नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जानिब से कुर्बानी करे तो इसमें कोई हर्ज नहीं बल्कि ये खुश नसीबी के हासिल करने का जरिया है
 

कुर्बानी की कज़ा

 अगर वक़्त पर कुर्बानी ना की जा सकी हो और जानवर पहले से मौजूद हो तो  वक़्त गुज़रने के बाद उसी जानवर को ज़िंदा सदका करना ज़रूरी है, 

कुर्बानी के दिनों के बाद पूरे जानवर ही की कीमत का सदका

अगर किसी शख्स पर कुर्बानी वाजिब थी लेकिन उसने कुर्बानी के दिनों में ना तो कुर्बानी की और ना जानवर खरीदा तो बाद में उस पर एक बकरे की कीमत का गरीबों पर सदका करना वाजिब है (यानी अब बड़े जानवर के सातवें हिस्से की कीमत काफी ना होगी बल्कि पूरे जानवर ही की कीमत देनी ज़रूरी होगी -

कई वर्षों से वाजिब कुर्बानी नहीं की

 अगर मालदार शख्स ने मालदार होने के बावजूद कुर्बानी छोड़ दी और कई साल तक कुर्बानी नहीं की तो हर साल की कुर्बानी के बदले में एक बकरा या बकरी की कीमत का सदका करना ज़रूरी है 

कौन कौन से जानवरों की कुर्बानी जाइज़ है?

  कुर्बानी क्योंकि एक खास इबादत का नाम है इसलिए हर हलाल जानवर की कुर्बानी जाइज़ नहीं बल्कि उसके लिए कुछ खास जानवर फिक्स हैं सिर्फ उन्हीं की कुर्बानी जाइज़ है, और वह जानवर यह हैं:

 *(१) ऊंट* *(२) ऊंटनी*

 *(३) गाय* *(४) बैल* 

*(५) भैंस* *(६) भैंसा*

 *(७) बकरा* *(८) बकरी*

 *(९) दुंबा* *(१०) मेंढा-*


कुर्बानी के जानवरों की उम्र

▪ऊंट, ऊंटनी : कम से कम पांच साल-

▪गाये, बैल , भैंस, भैंसा: कम से कम दो साल-

▪बकरा, बकरी, दुंबा, भेड़, मेंढा: कम से कम एक साल -

 अगर कुर्बानी के जानवरों की उम्र ऊपर बताई गई उम्र से कम हो, भले एक दिन ही सही, तो ऐसे जानवर की कुर्बानी जाइज़ नहीं -

छे (६) महीने का दुंबा, मेंढ़ा और भेड़:

दुंबा, भेड़, और मेंढ़ा अगर साल से कम हो और कम से कम छे महीने या उससे ज़ियादा का हो, लेकिन इतना सेहत मंद और बड़ा हो कि एक साल का मालूम होता हो, और उस में और एक साल की उम्र वाले दुंबों में फरक़ ना हो सके, तो उनकी कुर्बानी तब भी जाइज़ है-

याद रहे कि ये हुक्म बकरी और बकरे के लिए नहीं है - 

जानवरों की उम्रों में इस्लामी साल का ऐतबार:

जानवरों की उम्रों में असल ऐतबार इस्लामी यानी चांद के साल का है,अंग्रेज़ी साल का ऐतबार नहीं,इसलिए चांद के ऐतबार से उम्र पूरी होना ज़रूरी है भले अंग्रेज़ी साल के ऐतबार से उनकी उम्र कम हो - 

अगर किसी जानवर की उम्र कुर्बानी के दिनों में पूरी हो रही हो, तो उम्र पूरी हो जाने के बाद ही उनकी कुर्बानी जाइज़ है -

 इसी तरह अगर किसी जानवर की उम्र कुर्बानी के तीसरे दिन पूरी हो रही हो तो तीसरे दिन ही कुर्बानी जाइज़ होगी, इससे पहले नहीं -


क़ुर्बानी के जानवरों में कम से कम 2 दांत होने की शर‌ई हैसियत:

क़ुर्बानी का जानवर जब क़ुर्बानी की उम्र को पहुंच जाता है तो आम तौर पर उसके दो दांत निकल आते हैं जो इस बात की निशानी हुआ करती है कि जानवर की क़ुर्बानी की उम्र पूरी हो चुकी है -
( क़ुर्बानी के जानवर और उनकी उम्र के लिए *भाग १३ और 14* देखिए)

लेकिन इसमें यह बात याद रहे कि असल एतबार उम्र का है, दांतो का नहीं, अगर किसी जानवर की उम्र पूरी हो चुकी हो लेकिन उसके दो दांत अभी तक नहीं निकले हों तो ऐसे जानवर की क़ुर्बानी भी जायज़ है-

अगर किसी जानवर के दांत पूरे ना हों लेकिन बेचने वाले का केहना है कि उम्र पूरी हो चुकी है भले ही दांत नहीं निकले हैं और जानवर की ज़ाहिरी हालत भी यही बता रही हो कि उम्र पूरी हो चुकी है, तो ऐसी सूरत में बेचने वाले की बात पर भरोसा करना दुरुस्त है, और अगर हो सके तो ऐसी बातों में किसी माहिर आदमी की राय ले ली जाए ताकि शक ना रहे-



कौन से जानवर में कितने लोग शरीक हो सकते हैं?

❇ बड़े जानवर जैसे ऊंट, ऊंटनी, गाय, बैल, भैंस, भैंसा में एक आदमी से लेकर 7 आदमी तक शरीक हो सकते हैं, चाहे दो हों या तीन हों या चार हों या 5/6 हों लेकिन 7 से ज्यादा लोगों का शरीक होना जायज़ नहीं-

❇ छोटे जानवर जैसे बकरा, बकरी, दुंबा, भेड़, मेंढ़ा  में से हर एक में सिर्फ एक आदमी ही की क़ुर्बानी जायज़ है इसमें एक से ज़्यादा का शरीक होना जायज़ नहीं......


मालदार शख़्स के जानवर के बच्चे का हुक्म

मालदार शख़्स ने क़ुर्बानी के लिए जो जानवर मुतअय्यिन किया था, अगर उस जानवर ने क़ुर्बानी से पहले बच्चे को जन्म दे दिया,तो उस बच्चे की क़ुर्बानी,उस शख़्स पर लाज़िम नहीं ! 

 मालदार शख़्स का क़ुर्बानी के जानवर को बदलना

मालदार शख़्स को इख़्तियार है कि जो जानवर उसने क़ुर्बानी के लिए मुतअय्यिन किया है, वह जानवर क़ुर्बानी से पहले बदलना चाहे तो बदल ले और उसकी जगह दूसरे जानवर की क़ुर्बानी करे! क्यूंकि मालदार शख़्स के मुतअय्यिन करने से क़ुर्बानी का जानवर मुतअय्यिन नहीं होता ; इसलिए उसे बदलने का इख़्तियार रहता है ! 


 फ़क़ीर के जानवर के बच्चे का हुक्म-

फ़क़ीर शख़्स ने जो जानवर क़ुर्बानी के लिए मुतअय्यिन कर रखा था,उसने क़ुर्बानी से पहले बच्चे को जन्म दिया,तो ऐसी सूरत में फ़क़ीर पर जानवर और उसके बच्चे दोनों की क़ुर्बानी लाज़िम है ; क्यूंकि ये जानवर फ़क़ीर की तरफ़ से मन्नत के दर्जे में है,और मन्नत के सब फायदे मन्नत ही के हुक्म में होते हैं,और ज़बह करने के बाद उस बच्चे का गोश्त सदक़ा करना लाज़िम है ! खुद इस्तेमाल करना जाइज़ नहीं ! 

 फ़क़ीर का क़ुर्बानी के जानवर को बदलना

फ़क़ीर शख़्स ने अगर जानवर क़ुर्बानी के लिए कह कर ज़बान से मुतअय्यिन कर लिया ; तो अब उसके लिए बदलने की इजाज़त नहीं  बल्कि इसी मुतअय्यिन जानवर की क़ुर्बानी लाज़िम है !



 
गुमशुदा जानवर बाद में मिल गया
अगर गुमशुदा जानवर बाद में मिल जाए तो उसकी कई सूरतें हैं۔

1- अगर मालदार का जानवर मिला है तो उस पर ख़ास इसी जानवर की क़ुर्बानी लाज़िम नहीं है,बल्कि किसी एक जानवर की क़ुर्बानी वाजिब होने के हिसाब से कर सकता है ! 
2- फ़क़ीर का गुमशुदा जानवर मिल गया और उसने अभी कोई और जानवर क़ुर्बानी की नियत से नहीं ख़रीदा था,तो उस पर सिर्फ़ हासिल शुदा जानवर की क़ुर्बानी लाज़िम है ! 
3- और अगर गुमशुदा के मिलने से पहले फ़क़ीर शख़्स कोई और जानवर ख़रीद चुका था,बाद में गुमशुदा भी मिल गया तो अब उस पर नए ख़रीदे हुए और हासिल होने वाले दोनों जानवरों की क़ुर्बानी लाज़िम है ! 

 नाबालिग़ और मजनून की तरफ़ से क़ुर्बानी                                नाबालिग़ बच्चे और मजनून शख़्स पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं है, (अगरचे वो मालदार ही क्यूँ ना हों),इसी तरह उनके औलिया पर भी उनकी तरफ़ से क़ुर्बानी लाज़िम नहीं,लेकिन अगर कर दें, तो बहतर है !           



 अहले ख़ाना और औलाद की तरफ़ से बिना इजाज़त क़ुर्बानी
अगर बाप का मामूल है कि वह हर साल अपने अहले ख़ाना और छोटे बड़े बच्चों  की तरफ़ से  क़ुर्बानी करता है तो सब की तरफ़ से क़ुर्बानी दुरुस्त है !चाहे अहले ख़ाना ने बाक़ायदा इजाज़त दी हो या नहीं दी हो ! 

 क़ुर्बानी करने वाला क़ुर्बानी से पहले वफ़ात पा गया
जिस शख़्स पर क़ुर्बानी वाजिब थी और वो क़ुर्बानी के दिनों में ही वफ़ात पा जाये और अभी उसने क़ुर्बानी भी नहीं की थी तो उससे क़ुर्बानी का वुजूब साक़ित हो जाता है,इसलिए उस पर क़ुर्बानी की वसिययत लाज़िम ना होगी ! 

 क़ुर्बानी के दिनों के बाद वफ़ात पाने पर वसियत लाज़िम है
अगर कोई शख़्स क़ुर्बानी के दिनों के गुज़रने के बाद वफ़ात पा जाये तो, उस पर बकरी की क़ीमत का सदक़ा करना या उसकी वसियत करना लाज़िम है !



 मरने वाले शरीक की क़ुर्बानी
अगर बड़े जानवर में हिस्सा लेने वाले किसी शरीक का क़ुर्बानी से पहले इंतिक़ाल हो जाये और उसके वारिसीन सब आक़िल बालिग़ हों और वो सब उसकी तरफ़ से क़ुर्बानी की इजाज़त दें , तो ये क़ुर्बानी दुरुस्त होगी और अगर तमाम वारिसीन या उनमे से कोई एक वारिस इजाज़त ना दें या तमाम वरिसीन या उनमें से कोई एक वारिस नाबालिग़ या ग़ैर आक़िल हो तो ऐसी सूरत में अगर मय्यित का हिस्सा लगा दिया गया  तो उस जानवर में शरीक किसी भी हिस्सेदार की क़ुर्बानी दुरुस्त ना होगी;क्यूंकि मय्यित का हिस्सा क़ुरबत ना रहेगा ! 

 बग़ैर वसियत मय्यित की तरफ़ से क़ुर्बानी
अगर कोई शख़्स अपने मरहूम अज़ीज़ों की तरफ़ से नफ़ली  क़ुर्बानी करे तो इसमें कोई हर्ज नहीं है,और ये सिलसिला उम्मत में बग़ैर किसी इख्तिलाफ के जारी व सारी है !और इस तरह की क़ुर्बानी का गोश्त कोई भी खा  सकता है!इसमें फ़क़ीर या ग़रीब की क़ैद नहीं ! 

 हुज़ूर (स•अ• व• ) की तरफ़ से क़ुर्बानी
अगर कोई शख़्स अपनी तरफ़ से हुज़ूर (स•अ• व• ) की जानिब से क़ुर्बानी करता है,तो इसमें कोई हर्ज नहीं बल्कि ये सआदत के हुसूल का ज़रीआ है